रील्स और बच्चे

बच्चों को फ्री मोबाइल तभी दें जब उन्हें अच्छे बुरे की समझ आ जाए, लेकिन फिर भी उनकी एक्टिविटी पर नज़र रखें। आज अगर हम किसी भी तरह की एक रील देख लेते हैं तो उसी तरह की रील्स की भरमार लग जाती है. इंटरननैट पर फैली अश्लीलता बच्चों को बहुत जल्दी आकर्षित कर रही है और यह एक चिंता का विषय है। यहीं से बनते हैं दीपक खजूरिया, संजय राय व निर्भया के बलात्कारी.

हमें अपना #कंटेंट खुद चुनना पड़ेगा: जैसा पढ़ेंगे, बच्चों को पढ़ाएंगे वैसा ही सोचेंगे और वही भाषा लिखेंगे या बोलेंगे, ये हम सब जानते हैं. आप क्या कंटेंट कंज़्यूम करते हैं नज़रिया वैसा ही बनता है. अब सवाल है कि आप क्या कंज़्यूम कर रहे हैं, कौन आपसे ये सब पढ़वा रहा है. कैसे रील्स, पोस्ट आपके मोबाइल में पहुंचती हैं इसे #टेक्नोलॉजी_कंपनिया तय करती हैं.
     उनके लिए बहुत आसान है एक ख़ास तरह का कंटेंट आप तक पहुंचाना और जब आप खुद वैसा कंटेंट तलाशने लगते हैं उनका काम पूरा हो जाता है.
#एल्गोरिदम का पूरा कब्जा आपके दिमाग में हो जाता है.
कुछ मुट्ठी भर लोग हैं जो हम लोगों को एक हिंसक जानवर बनाने में तुले हुए हैं. टेक्नोलॉजी वैज्ञानिक सोच को खत्म कर रही है. लोगों को सांप्रदायिक, नस्लवादी, हिंसक, बेईमान और सेक्स का कीड़ा बना रही है.
जो कंटेंट अपने आप मुझ तक पहुंचता है उसे मैं शक की निगाह से देखती हूँ और जिस विषय के बारे में जानना चाहती हूं खुद उसके रिसोर्स तलाशती हूं.
पिछले कोई एक साल से अमेरिका से डेमोक्रेटिक कंटेंट आना बंद हो गया. न फॉलो करने के बावजूद ट्रंप या उसके विचारों को सही ठहराने वाला भरा रहता है (यह एक उदाहरण पेश किया है) कोई भी एक चीज़ सर्च कर लीजिए, बस वो वही एक चीज़ लेकर हाथ धोकर आपके पीछे पड़ जाएंगे.
      इसलिए दिमाग ठीक रखना है. समाज और अपने बच्चे बचाने हैं तो #एल्गोरिदम से लड़ना पड़ेगा. इसे हराने के तरीके निकालने होंगे.
समय कम है – आधे जानवर तो बन ही चुके हैं. एक मिनट ठहरकर सोशल मीडिया के पहले के समाज को याद कीजिए, सब समझ में आ जाएगा.

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