कामाख्या न्यूज
हरिद्वार। श्रीमहंत नरेंद्र गिरि महाराज के ब्रह्मलीन के बाद से अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद दो गुटों में विभाजित दिखाई दे रही है। शनिवार को महानिर्वाणी अखाड़ा गुट द्वारा परिषद के पुनर्गठन और नए पदाधिकारियों की घोषणा के बाद विवाद एक बार फिर गहरा गया है।
दूसरे गुट ने इस चुनाव को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए कहा कि अखाड़ा परिषद की कार्यकारिणी का गठन तभी वैध माना जा सकता है, जब सभी 13 अखाड़ों की उपस्थिति और सहमति से चुनाव कराया जाए। उनका कहना है कि हरिद्वार में हुई बैठक में सभी अखाड़ों को आमंत्रित नहीं किया गया, इसलिए वहां गठित कार्यकारिणी का कोई वैधानिक महत्व नहीं है।
हालांकि, इस दावे पर कई प्रश्न भी उठते हैं। यदि सभी 13 अखाड़ों की सहभागिता को ही परिषद की वैधता का आधार माना जाए, तो यह कसौटी दूसरे गुट पर भी समान रूप से लागू होती है। वर्तमान में दूसरे गुट को भी सभी 13 अखाड़ों का समर्थन प्राप्त नहीं है। ऐसे में केवल सीमित संख्या के अखाड़ों के समर्थन के आधार पर अखाड़ा परिषद की वैधता भी विवाद से परे नहीं कहा जा सकती।
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू परिषद की पारंपरिक संरचना से जुड़ा है। अखाड़ा परिषद को चतुसम्प्रदाय की संस्था माना जाता है, जिसमें संन्यासी, उदासीन, बैरागी और निर्मल परंपराओं का प्रतिनिधित्व आवश्यक माना जाता है। परंपरा यह भी रही है कि यदि अध्यक्ष संन्यासी अखाड़े से हो, तो महामंत्री अन्य तीन सम्प्रदायों में से किसी एक का प्रतिनिधि होता है। जबकि वर्तमान में दूसरे गुट में अध्यक्ष और महामंत्री दोनों संन्यासी परंपरा से हैं, जिससे भी परंपरागत व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
इसके अतिरिक्त, परिषद की परंपरा के अनुसार अखाड़े के वर्तमान पदाधिकारियों को ही परिषद में मतदान और पदाधिकारी बनने का अधिकार होता है। यदि इस संबंध में किसी पदाधिकारी की पात्रता पर विवाद है, तो उसका समाधान भी स्पष्ट और पारदर्शी प्रक्रिया से होना चाहिए।
दोनों गुट वैधता का दावा कर रहे हैं, लेकिन अपने-अपने तर्कों को परंपराओं, नियमों और व्यापक सहमति की कसौटी पर सिद्ध करने की चुनौती है।
