राज्य स्तरीय हितधारक परामर्श : “किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 : क्रियान्वयन के एक दशक की समीक्षा एवं भावी दिशा”
हरिद्वार 20 सितम्बर
माननीय मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता के मार्गदर्शन में किशोर न्याय समिति, उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय द्वारा महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग, उत्तराखण्ड सरकार के सहयोग से आज हयात प्लेस, बहादराबाद, हरिद्वार में राज्य स्तरीय हितधारक परामर्श का सफल आयोजन किया गया।

कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री मनोज कुमार गुप्ता के साथ माननीय न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी, माननीय न्यायमूर्ति रवीन्द्र मैठाणी, माननीय न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल (अध्यक्ष, किशोर न्याय समिति), माननीय न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित, माननीय न्यायमूर्ति आलोक महरा, माननीय न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय तथा माननीय न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का शुभारम्भ माननीय मुख्य न्यायाधीश एवं सभी माननीय न्यायाधीशों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। दीप प्रज्ज्वलन के अवसर पर मातृ आँचल कन्या विद्यालय, राजागार्डन, हरिद्वार की छात्राओं तथा राजकीय बाल देखरेख गृह, रोशनाबाद, हरिद्वार के बालिकाओं ने सामूहिक रूप से भावपूर्ण सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। उद्घाटन सत्र में इन सभी बच्चों को माननीय न्यायाधीशों की धर्मपत्नीगण द्वारा उपहार प्रदान कर सम्मानित किया गया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री मनोज कुमार गुप्ता ने इस महत्वपूर्ण परामर्श के आयोजन हेतु किशोर न्याय समिति एवं महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग को बधाई दी।

उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता गैब्रिएला मिस्ट्राल के प्रसिद्ध कथन—“बच्चे का विकास कभी स्थगित नहीं किया जा सकता”—का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रभावी क्रियान्वयन के बिना कोई भी उत्कृष्ट कानून केवल एक अधूरा वादा बनकर रह जाता है। उन्होंने सभी हितधारकों से अधिनियम के उद्देश्यों को धरातल पर उतारने हेतु व्यावहारिक एवं क्रियान्वयन-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया।

मुख्य वक्तव्य देते हुए माननीय न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल, अध्यक्ष, किशोर न्याय समिति ने अधिनियम के दस वर्षों की यात्रा की समीक्षा करते हुए कहा कि “जो बच्चा विधि के साथ संघर्ष की स्थिति में है अथवा जिसे देखरेख एवं संरक्षण की आवश्यकता है, वह सबसे पहले एक बच्चा है—जो दण्ड नहीं, बल्कि पुनर्वास; और अलगाव नहीं, बल्कि समाज में पुनः एकीकरण का अधिकारी है।”

उन्होंने कहा कि “कोई भी कानून उतना ही प्रभावी होता है जितनी प्रभावी उसे लागू करने वाली संस्थाएँ तथा उनके मध्य समन्वय होता है।”

अपने प्रस्तावना वक्तव्य में माननीय न्यायमूर्ति आलोक महरा ने कहा कि “न्याय में विलम्ब किसी बच्चे के जीवन और भविष्य को गहराई से प्रभावित कर सकता है” तथा समयबद्ध एवं बाल-केंद्रित न्यायिक प्रक्रिया को अत्यंत आवश्यक बताया।

