धीरे-धीरे होते हैं बदलाव

सुदेश आर्या

हम तक़रीबन रोज़ आईना देखते हैं। चेहरे-मोहरे में बदलाव आते हैं लेकिन वो इतनी धीमी गति से होते हैं कि हमें दिखते नहीं। हमें लगता है हम उतने ही जवान हैं। फिर एक दिन अचानक हम पांच साल पुरानी तस्वीर देख लेते हैं तो एहसास होता है कि चेहरे पर उम्र का असर आया तो है। ऐसा सभी के साथ होता है, होता रहेगा, फिर चाहे कोई भी क्रीम लगा लो।

इसी तरह बदलावों की रफ़्तार भी बहुत धीमी पर सतत होती है। इतनी धीमी कि हमें एहसास नहीं होता। लेकिन धीमी रफ़्तार का मतलब ये नहीं कि बदलाव असर नहीं डालेंगे।

अच्छी बात ये है कि उम्र बढ़ना रोकने के लिए कोई क्रीम नहीं लेकिन विचारों की गिरावट रोकने के लिए ढेरों उपाय हैं। ना सिर्फ़ गिरावट रोकने के बल्कि वैचारिक उत्थान के उपाय मौजूद हैं बशर्ते इंसान खुद राज़ी हो।

एक चिड़चिड़ा सनकी बुज़ुर्ग घर में एक कोने में बिठा दिया जाता है। पूरे दिन बस राजनीति, राहुल-मोदी, हिन्दू-मुसलमान करने वाले से भी जवान लोग दूर भागेंगे।

बूढ़ा तो वही पसंद किया जाएगा तो जवानों से उनकी भाषा में बात कर सके। मुंह खोले तो अपनी बातों से उनको हैरान कर सके। उसके पास ऐसे किस्से हों जो जवानों को आकर्षित करें। उसके पास ऐसे विचार हों जिनमें उमंग हो, उत्साह हो, भविष्य का सपना हो।

रोज़ सुबह आधा घंटा घूमें, नया सीखें, उत्साहित रहें, संगत सुधारें, टीवी बंद करें और किताबें खोलें, संगीत सुनें, जेब में पैसे हों तो घूमे-फिरें, अगर रुझान हो तो नाचना-गाना-बजाना सीखें, नए बच्चों की सुनें, दोस्तो में हमउम्र भी हों और बेहद कम उम्र भी हों।ये कुछ उपाय हैं जो एक प्यारा बुढ़ापा लायेंगे।           

ऐसा बूढ़ा बनने की तैयारी आज से ही करनी होती है। कोई भी तैयारी आज से ही शुरू करनी होती है। और एक दिन में कुछ नहीं होता।

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