देहरादून । उत्तराखंड में कांग्रेस और बीजेपी दो ही पार्टियों में सत्ता प्राप्त करने की जंग रहती है, और दोनों ही पार्टियों में विधायक और नेता अदला-बदली करते रहते हैं जहां जिसको फायदा दिखाई देता है वह दूसरी तरफ छ्लांग लगा देता है ,और छलांग लगाने के बाद मंत्रिमंडल की कुर्सी पर विराजमान होकर मलाई चाटने में व्यस्त हो जाता है।

दोनी ही दलों के नेता एक ही थैली के चट्टे बट्टे है।उत्तराखंड के विकास के लिए नही अपने विकास के लिए करते है कार्य।
इस मामले में चाहे कांग्रेस हो चाहे बीजेपी हो दोनों के ही नेता और मंत्री एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं, किसी को यह नहीं कहा जा सकता कि यह उत्तराखंड के विकास के लिए कार्य कर रहा है, या इसके दिमाग में उत्तराखंड के विकास को लेकर कोई सोच है । जिन लोगों ने उत्तराखंड बनाने में अपना योगदान दिया था वह महिलाएं जिन्होंने अपनी आबरू तक लुटवाई थी और वह युवा जिन्होंने अपनी छाती पर गोलियां खाकर स्वर्ग सीधारा है , ना तो उनको इस उत्तराखंड के बनने से कोई लाभ हुआ है और ना ही उनके परिजनों को कोई लाभ हुआ है, लाभ हुआ है तो कांग्रेस और बीजेपी के नेताओं के साथ-साथ ब्यूरोक्रेट्स को,

उत्तराखंड के विकास के लिए केंद्र सरकार से मिलने वाले पैसे पर रहती है निगाह।
जितना पैसा उत्तराखंड के विकास के लिए केंद्र सरकार से आता है उसमें से आधे से ज्यादा नेताओं और अधिकारियों की जेब में चला जाता है, इसको कहने में कोई संकोच नहीं है, की उत्तराखंड के वे नेता जिनमें से इक्का दुक्का को छोड़ दिया जाए तो बाकी नेता जो आज बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमते व फाइव स्टार होटल में भोजन करना महंगी शराब का सेवन करना इनकी आदत में अब शुमार हो गया है, दिन में तीन-तीन बार वस्त्र चेंज करना, बाकी और चीजो के बारे में व राज्य बनने के बाद इनकी सम्पत्ति के बारे में तो कहना ही बेकार हैं, सभी नामधारी नेता अरबों खरबों में खेल रहे है।

कॉंग्रेस को खुद कोंग्रेसी निगल रहे है, हरीश रावत सत्ता का मोह त्यागना नही चाहते।
हाल यह है कि कांग्रेस को खुद कांग्रेसी निगल रहे हैं, कांग्रेस के अंदर सभी नेता मुख्यमंत्री के दावेदार हैं , उत्तराखंड में सबसे बड़ा गुट हरीश रावत का है ,हरीश रावत के बाद पीतम सिंह व अब गणेश कोदयाल को भी लाइन में देखा जा सकता है। लेकिन हरीश रावत के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है, की वह कब किस समय क्या कह दें , क्या कर दें कुछ नहीं कहा जा सकता, उनका सबसे बड़ा विरोध कांग्रेसियों व राज्य की जनता में इस बात को लेकर है की उनको सबसे पहले तो आधा दर्जन टिकट अपने परिवार के लिए चाहिए एक टिकट उनके पुत्र के लिए एक टिकट उनकी पुत्री के लिए एक टिकट उनकी पत्नी के लिए एक टिकट उनके खुद के लिए और बाकी दो टिकट भी उनके करीबी रिश्तेदारों के लिए आरक्षित हो तभी वह आगे कुछ कार्य कर सकते हैं, अन्यथा वे कभी ढोल बजाने की बात करते हैं।

कभी बकप बकप करने की बात करते हैं कभी चुनाव न लड़ने की बात करते हैं, लेकिन चुनाव लड़कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने की इच्छा अभी भी उनके मन में हिलोरे मारती रहती है, कारण यह है की सत्ता का सुख नेताओं का आखरी दम तक पीछा नहीं छोड़ता है, हरीश रावत जी को लंबे समय से सत्ता सुख का शौक पड़ा हुआ है। लेकिन उत्तराखंड के बाकी नेताओं के पास ज्यादा समय से ये सुख नहीं है, कांग्रेस में ही प्रीतम सिंह जो केवल अपने पिता श्री स्वर्गीय गुलाब सिंह जी के नाम पर राजनीति करते हैं , और अब गणेश गोदियाल जी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनकर पधारे हैं, शायद वह इसलिए अध्यक्ष बनाये गये हैं, कि वह कोई कारनामा करके दिखा सकें।

विगत दो माह में गोदियाल साहब राज्य में बीजेपी को घेरने के कई बड़े मौके गंवा चुके है।
अभी विगत दो माह के बीच में ही बीजेपी की जिस कदर फजीहत उत्तराखंड के में हुई है वह पूरे राज्य ही नहीं पूरे देश ने देखी है ,उसके बावजूद भी यह दिखाई नहीं पड़ रहा है कि कांग्रेस 2027 के चुनाव में कोई कारनामा करके दिखा पाएगी हालांकि अभी चुनाव में 10 महीने से अधिक का समय है, इस अवधि में यदि सारे कांग्रेसी एक हो जाए और चुनाव लड़े तो बीजेपी की उत्तराखंड से विदाई संभव है, अन्यथा बीजेपी उत्तराखंड में पुनः राजनीति में वापस आ जाएगी,

उत्तराखंड बीजेपी में भी इस समय गुटबाजी हावी है।
ऐसा नहीं है की उत्तराखंड में गुटबाजी बीजेपी में नहीं है, उत्तराखंड बीजेपी में भी पुष्कर धामी के कार्यों से दो सांसद पांच विधायक और कई नेता बेहद नाराज है। जिसमे अनिल बलूनी, त्रिवेंद्र सिंह रावत ,अरविंद पांडे ,मदन कौशिक तो लगभग खुले आम ही पुष्कर सिंह धामी की नीतियों से खफा दिखाई देते हैं। लेकिन हाई कमान का पुष्कर सिंह धामी के सिर पर हाथ होने के कारण पुष्कर सिंह धामी का कोई कुछ बिगाड़ नहीं पा रहा है।

लेकिन 2027 के चुनाव में शायद इन चार महत्वपूर्ण नेताओं की नाराजगी पुष्कर पुष्कर सिंह धामी को परेशानी में डाल सकती है ,कुछ लोगों का तो मानना यह है की धामी जी के नेतृत्व में चुनाव न होकर किसी नए चेहरे के नेतृत्व में ही 2027 का चुनाव लड़ा जाएगा, अब देखना यह है की यदि पुष्कर सिंह धामी को हटाया जाता है, तो कौन नया नौजवान राज्य की कमान संभालेगा जिसके नेतृत्व में 2027 के चुनाव होंगे ,क्योंकि बीजेपी हाई कमान किसी दमदार या नाम धारी नेता को तो सत्ता की कुर्सी सौपेगा नही कुर्सी तो ऐसे अनाम से नेता को सौंपी जाती है जिसने कभी स्वप्न में मंत्री बनने तक की कल्पना न की हो उसे मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी जाती है,

धामी जल्दी से कुर्सी नही छोडेंगे,मोदी जी की पसंद है धामी जी।
हालांकि पुष्कर धामी इतनी जल्दी से हार मानने वाले नहीं है वे भी हाई कमान के आगे पीछे परिक्रमा करने एक माह में दिल्ली पहुंच जाते हैं, और हाई कमान भी खासकर नरेंद्र मोदी पुष्कर सिंह धामी को काफी पसंद करते हैं, तो ऐसे में देखना यह होगा की 2027 के चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी सत्ता हासिल करने के लिए किस तरीके की शतरंज बिछाती है।
