देहरादून ।
नरेश गुप्ता
मतदाता का रूख देखते हुए लगता है की कांग्रेस की स्थिति धीरे-धीरे मजबूत हो रही है।
जबकी कांग्रेस के नेता मतदाता का रुख नही भांप रहे है, कॉंग्रेस आधा दर्जन धड़ो में बटी हुई हैं।
उत्तराखंड कांग्रेस की प्रभारी शैलजा का इस राज्य में कोई प्रभाव नहीं है। इसलिए उनके राज्य का प्रभारी होने से मतदाताओं पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। शैलजा जी तो हरियाणा के चुनावों में भी अपना जलवा दिखा चुकी है। इन मैडम के महत्वकांक्षी होने के कारण ही हरियाणा में बीजेपी की सरकार बनी है।हरीश रावत को लेकर कांग्रेस के नेता उहापोह की स्थिति मे है, लेकिन हरीश रावत को आगे कर ही चुनाव लड़ने में कॉंग्रेस को फायदा हो सकेगा।कोंग्रेस के अन्य नेता अभी तक वातानुकूलित कमरों में बैठे केवल हवाई घोड़े दौड़ा रहे हैं।

हरीश रावत ने राज्य का दौरा शुरू कर दिया है, वह राज्य की जनता की नवज टटोलने के लिए निकल पड़े हैं। पैदल ही ऊंचे-नीचे चढ़ाई वाले रास्तों पर पैदल चल रहे हैं, और मतदाताओं तक पहुंच रहे हैं।
देहरादून में 2027 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित है, इस राज्य में इस बार भी कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही सीधी टक्कर देखने को मिलेगी हालांकि लम्बे समय से गुमनाम सी हो चुकी यूकेडी भी राज्य में जोर आजमाइश करने के लिए अपने प्रत्याशी उतारेगी।

उत्तराखंड में सत्ताधारी बीजेपी अपनी जीत निश्चित मानकर चल रही है । लेकिन बीजेपी के सामने कई ऐसे प्रकरण है जिनको लेकर आम जनता बीजेपी की जीत पर अब शंका करने लगी है। इसलिए लोगों को लगता है कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे कांग्रेस की स्थिति और मजबूत होगी।
अंकिता भंडारी प्रकरण चुनाव के दौरान और गरमाएगा, जो सत्ता धारी ,धामी सरकार को परेशान करेगा। चंपावत में नाबालिग बालिका के साथ दुष्कर्म की घटना भी बीजेपी को परेशान कर सकती है।

इस राज्य में हुआ अंकिता भंडारी मर्डर केस अभी तक शांत नहीं हुआ है ।लगातार अंकिता भंडारी का प्रकरण राज्य में गूंज रहा है ,और चुनाव आते-आते यह प्रकरण और गति पकड़ सकता है। जो की राज्य की सत्ताधारी धामी सरकार के लिए मुसीबत का सबब बन सकता है।
बीजेपी में भी दो फाड़ साफ-साफ दिखाई दे रहे हैं, मुख्यमंत्री धामी की कार्य शैली से सत्ताधारी दल भाजपा के कई वरिष्ठ नेता नाराज है। और कई बार यह नाराज नेता आला कमान तक भी अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। बावजूद इसके धामी जी की ग्रह चाल ठीक होने के कारण अभी तक उनका कुछ नहीं बिगड़ सका है।

2027 के चुनाव में ऊँट किस करवट बैठेगा यह कह पाना तो फिलहाल मुश्किल दिखाई दे रहा है।
कांग्रेस में भी गुटबाजी चरम पर है ,यह गुटबाजी हरीश रावत को लेकर है , लेकिन राज्य में देखा जाए तो कांग्रेस के पास हरीश रावत से वरिष्ठ व अनुभवी नेता कोई दूसरा नहीं है। कांग्रेस में यशपाल आर्य को थोड़ा गंभीर नेता माना जा सकता है। लेकिन वह भी दलित वोटो पर अपनी कोई पकड़ आज तक नहीं बना सके हैं। बाकी रही बात प्रीतम सिंह की व गणेश गोदियाल की यह दोनों तो राज्य के दूर दराज इलाकों में जाने से भी किनारा करते हैं। केवल देहरादून के कॉंग्रेस कार्यालय से ही राजनीति करते रहते हैं ।

जबकि हरीश रावत फिल्ड में निरंतर बने रहते हैं ,और दूर दराज के दुर्गम क्षेत्रों में भी पैदल ही लोगों से मिलने पहुंच जाते हैं ।इसलिए इस राज्य में कांग्रेस के पास हरीश रावत से अनुभवी कोई नेता नहीं है ।राजनीति के हर उठा पटक और पहलुओं से हरीश रावत अच्छी तरीके से वाकिफ है । इसलिए हरीश रावत को तो आगे करके ही कांग्रेस को चुनाव मैदान में आना होगा।
हरीश रावत को भी परिवार मोह को त्यागते हुए केवल परिवार के किसी एक व्यक्ति को ही राजनीति में आगे रखना होगा।
राज्य के दलित मतों पर दोनों दलों की निगाहें टिकी है , राज्य में दलित वोट की स्थिति स्पष्ट दिखाई नहीं दे रही है। यह दलित मतदाता बीजेपी की तरफ जाएगा या कांग्रेस की तरफ जाएगा ।

हालांकि दलित वोटो को बीजेपी को दिलाने की जिम्मेदारी एक आईपीएस नेताजी ने ले रखी है। यही कारण है कि अब तक इन आईपीएस नेताजी की कई ऐसी अजीब हरकतें होने के बावजूद राज्य की सत्ताधारी पार्टी इनकी सारी हरकतों को हजम कर रही है ।क्योंकि इन्होंने सरकार को यह समझा रखा है की वह राज्य के सारे दलित वोट बीजेपी को दिलवाएंगे।
कांग्रेस की बात करें तो कांग्रेस के यशपाल आर्य दलित वोटो पर अभी तक अपनी कोई पकड़ मजबूत नहीं कर पाए हैं ।इसलिए दलित वोट भी मौके की नजाकत को देखते हुए ही वोट देगा।

राज्य की 80 प्रतिशत महिलाएं धामी सरकार से अंकिता भंडारी प्रकरण को लेकर नाराज है ।
इतना तय है कि राज्य की 80% महिलाएं कांग्रेस को ही वोट कर सकती है, क्योंकि वह अंकिता भंडारी मर्डर केस को लेकर राज्य की धामी सरकार से काफी नाराज है। क्योंकि ये महिलाएं मानती हैं की अंकिता भंडारी केस में अंकिता को राज्य सरकार न्याय नहीं दिला पा रही है। इसलिए जहां यह महिलाएं राज्य सरकार से नाराज है वहीं अंकिता भंडारी का भूत भी राज्य सरकार की धामी सरकार को 2027 के चुनाव में काफी परेशान कर सकता है। इसके बावजूद यदि अमित शाह ने इस राज्य में भी दिलचस्पी दिखा दी तो फिर तो यहाँ भी बीजेपी की बल्ले बल्ले होना तय है।

