देहरादून (उत्तराखंड)। उत्तराखंड के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की पत्नी गीता धामी के आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने की महत्वाकांक्षा की चर्चाएं ज़ोरों पर हैं। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए यह कयास लगाए जा रहे हैं कि वह जल्द ही सक्रिय राजनीति में कदम रख सकती हैं।

🔥 राजनीतिक महत्वाकांक्षा: चर्चा का केंद्र
गीता धामी पूर्व में मुख्यमंत्री धामी के लिए खटीमा और चंपावत विधानसभा उपचुनावों में सक्रिय रूप से प्रचार कर चुकी हैं, जिससे उनकी राजनीतिक सक्रियता जगजाहिर है। वह लगातार जनता से संपर्क में रहती हैं और विभिन्न सामाजिक व क्षेत्रीय कार्यक्रमों में हिस्सा लेती रही हैं। इसी पृष्ठभूमि ने उनकी खुद चुनाव लड़ने की अटकलों को हवा दी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड में परिवार के सदस्यों का राजनीति में आना कोई नई बात नहीं है, और एक मजबूत जनाधार वाले मुख्यमंत्री की पत्नी होने के नाते, उनका राजनीतिक सफर आसान हो सकता है।

📍 कौन सी सीट हो सकती है ‘कर्मभूमि’?
अगर गीता धामी चुनाव लड़ने का मन बनाती हैं, तो सबसे ज़्यादा चर्चा जिस सीट की है, वह है मुख्यमंत्री धामी की पुरानी सीट खटीमा (Khatima)।
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खटीमा सीट पर नज़र: खटीमा वह सीट है जहाँ से सीएम धामी को पिछले विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। यह सीट धामी परिवार की पारंपरिक सीट मानी जाती है, और यहाँ गीता धामी की सक्रियता भी काफी ज़्यादा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पार्टी हाई कमान इस सीट पर जीत सुनिश्चित करने के लिए ‘फैमिली फैक्टर’ का इस्तेमाल कर सकती है।
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अन्य संभावित सीटें: इसके अलावा, कुछ गलियारों में यह भी चर्चा है कि वह चंपावत या उधम सिंह नगर जिले की किसी अन्य सीट से भी अपनी राजनीतिक पारी शुरू कर सकती हैं, खासकर इसलिए क्योंकि चंपावत उपचुनाव में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालांकि, खटीमा की चर्चा सबसे ज़्यादा है।

💬 गलियारों में हो रही चर्चा
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर और बाहर भी इस संभावित एंट्री को लेकर खुसुर-पुसुर जारी है।
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समर्थकों का उत्साह: उनके समर्थक मानते हैं कि गीता धामी का एक मज़बूत सामाजिक आधार है और महिला होने के नाते वह महिला मतदाताओं को प्रभावित करने में सफल रहेंगी।
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विरोधियों का तर्क: वहीं, विपक्षी दल ‘परिवारवाद’ (Dynastic Politics) को बढ़ावा देने का आरोप लगाकर इस कदम की आलोचना कर सकते हैं।
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पार्टी का रुख: पार्टी सूत्रों का कहना है कि अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व को लेना है। अगर पार्टी को लगता है कि गीता धामी की उम्मीदवारी से सीट पर जीत सुनिश्चित हो सकती है, तो उन्हें टिकट दिया जा सकता है।

फिलहाल, सभी की निगाहें BJP के शीर्ष नेतृत्व पर टिकी हैं कि क्या उत्तराखंड की ‘फर्स्ट लेडी’ अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करते हुए चुनावी मैदान में उतरेंगी।

