देहरादून। उत्तराखंड के जन्म से लेकर आज तक दो ही पार्टियों का राज चल रहा है ।जब से उत्तराखंड बना है। एक कांग्रेस दूसरी बीजेपी, बीजेपी ने काफी मेहनत करके या तिकड़मबाजी कहें दो-दो बार लगातार सरकार बनाई है।
कांग्रेस में भी पंडित नारायण तिवारी जी रहे हैं, विजय बहुगुणा रहे हैं ,हरीश रावत रहे हैं ।यह तीन लोग कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद पर उत्तराखंड में रह चुके हैं ।
लेकिन इस बार हरीश रावत का कांग्रेसी विरोध कर रहे हैं ,विरोध केवल इस बात का है की हरीश रावत अपने परिवारवाद को ज्यादा महत्व देते हैं ।लेकिन जो कांग्रेसी विरोध कर रहे हैं क्या वे परिवारवाद को बढ़ावा नहीं देते हैं ।

ऐसा कौन सा नामधारी बड़ा नेता है। जिसके बेटे भाई पत्नी से लेकर कई रिश्तेदार तक राजनीति में ना हो, लेकिन क्योंकि इन्हें तो हरीश रावत का विरोध करना है। इसलिए बातें तो बनानी पड़ेगी ।
जबकि हरीश रावत को और हरक सिंह रावत को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश कांग्रेस के नेताओं ने देहरादून हल्द्वानी और हरिद्वार के अलावा चौथे राज्य का मुंह तक नहीं देखा है। राज्य में भृमण करने की तो बात छोड़ दीजिए।

और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के लिए लालायित रहते हैं। इस बार भी यदि कांग्रेसियों ने एकजुट होकर भाजपा का मुकाबला नहीं किया तो भविष्य में यह जान लीजिएगा, कभी भी कांग्रेस को उत्तराखंड में लौटने का मौका नहीं मिलेगा।
इस बार यही मौका है जो कांग्रेस को विजय श्री दिला सकता है। और इसके लिए हरीश रावत को तो आगे रखकर चलना ही होगा ।हरीश रावत की अगर उपेक्षा करेंगे, तो किसी कीमत पर भी राज्य में कांग्रेस की सरकार नहीं बन पाएगी।

और जिस तरीके से अब तक इन चार-पांच नेताओं के काम बीजेपी की सरकार में भी चल रहे हैं। भविष्य में भी चलते रहेंगे, लेकिन अगर उत्तराखंड की सत्ता पर काबिज होना है, तो कांग्रेस को तो हरीश रावत को आगे रखना ही होगा ।
लेकिन हरीश रावत को भी अपने पुत्र और पुत्री व पत्नी मोह से अब छुटकारा पाकर या किसी एक व्यक्ति को आगे रखकर उसको राजनीति में आगे बढाना होगा तभी काम होगा। पूरे परिवार के लोगों को न तो विजय श्री हासिल होगी। और कांग्रेसियों का विरोध भी हरीश रावत को झेलना ही पड़ेगा।

रही बात शैलजा जी की शैलजा जी उत्तराखंड कांग्रेस की प्रभारी हैं ।और उत्तराखंड के कांग्रेसियों को एकजुट होकर चुनाव मैदान में उतरने का पाठ पढ़ाती है। जबकि पिछले हरियाणा के चुनाव में वह खुद ही कोप भवन में पहुंच गई थी।

और जीती जिताई कांग्रेस को भाजपा के सुपुर्द करवा दिया था ।तो ऐसी प्रभारी महोदय क्या नसीहत देंगी। अब देखना यह है कि 2027 विधानसभा चुनाव की क्या तैयारी कांग्रेस करती है। फिलहाल तो अभी कोई तैयारी कांग्रेस करती दिखाई नहीं दे रही है।

लेकिन उत्तराखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी फूंक फूंक कर कदम रख रहे हैं। उनके लिये भी यह चुनाव करो या मरो का सवाल लिये खड़ा है । धामी जी चुनाव की हर बारीकी को बहुत ही गंभीरता से देख रहे हैं ।

कांग्रेस को बीजेपी से सत्ता हथियाना इतना आसान नहीं है ।मेहनत तो करनी ही पड़ेगी तभी मेहनत का कुछ फल मिलेगा, घर बैठे कुछ मिलने वाला नहीं है। हालांकि बीजेपी में भी कलह है। बीजेपी की कलह शायद चुनाव आते-आते कुछ सुलझ जाए या ऊपर से हाई कमान द्वारा सुलझा दी जाए।
