देहरादून । एक जमाना था जब राजनीति को समाज सेवा का नाम दिया जाता था, ज्यादा लोगों के बारे में तो मैं नहीं जानता ।लेकिन मैं फिर भी बहुत सारे बड़े-बड़े नेताओं को चाहे वह कांग्रेस के हो या बीजेपी के हो इन लोगों को मैंने दरिया बिछाते हुए तक देखा है ,और आज यह लोग कहां से कहां पहुंच गए हैं ।
यह इन लोगों की मेहनत का और परिश्रम का फल है ।लेकिन आज के जमाने की राजनीति सेवा नहीं है वह तो केवल और केवल व्यापार है, आम जनमानस जानता है की यह कुरीतियां राजनीति में ग्राम स्तर से लेकर और केंद्र तक पहुंच गई है ।
सबसे पहले ग्राम प्रधान को ले लें , ग्राम प्रधान बनने के लिए 40 से 50 लख रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं और कुछ मामलों में गाँव मे ये प्रधानी की राजनीति जिंदगी भर की दुश्मनी में भी तब्दील हो जाती है, चाहे वह जिला पंचायत का सदस्य हो वह भी 40 से 50 लख रुपए या एक करोड रुपए तक खर्च करके ही जिला पंचायत का सदस्य बनता है।
जिला पंचायत अध्यक्ष के बारे में तो आप जानते ही हैं कि उसको कितने करोड खर्च करने पड़ते हैं। लाखों में नहीं करोड़ों में, नगर निगम का पार्षद बनने के लिए भी नेताजी को 40,से 50 लाख रुपए तो मामूली बात है, मेयर बनने के लिए भी करोड़ों रुपए खर्च करने पड़ते हैं। तो इतनी भारी भरकम राशि ये समाज सेवी समाज सेवा के लिये तो ख़र्च कर नही रहे है,
यही हाल विधायक बनने का है विधायक भी 5 करोड़ से कम खर्च करने वाला तो सोच भी नहीं सकता कि विधायक बन जाऊ रही बात सांसद जी की सांसद जी को भी 5 से 10 करोड़ तो खर्च करने ही पड़ते हैं ,और राज्यसभा पहुंचने की मंत्री बनने की और जाने क्या-क्या बनने की उसके बारे में मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा, क्योंकि इस कुर्सी का कोइ रेट फिक्स नही है।
आप इतना जरूर समझ ले राज्यसभा पहुंचने के लिए इतना पैसा खर्च करना पड़ता है ,की आप सोच भी नहीं सकेंगे। इतना पैसा खर्च करके जनता की सेवा करने आएंगे या अपना लगाया हुआ पैसा वापस लेने उसके ऊपर ब्याज लेने और साथ ही अपना कारोबार चलाने के लिए आएंगे या जनता की सेवा करेंगे ।यह बात कोई भी आदमी आसानी से समझ सकता है ।

सभी पार्टिया चाहे वह बीजेपी हो चाहे वह कांग्रेस हो चाहे वह सपा हो चाहे वह बसपा और न जाने कौन कौन सी कितनी पार्टियां है जिनके बारे में कोई जानकारी भी नहीं है , सब समाज सेवा नही व्यापार कर रहे है। चुनाव में विजय प्राप्त करते ही नेताजी पर इस तरह से दौलत बरसाना शुरू होती है की नेताजी के सात नही 14 पुस्ते तर जाते हैं,
एक स्थान पर मैं कुछ विद्वानों के साथ वर्तमान राजनीतिक पर चल रही चर्चा को सुन रहा था, क्योंकि मैं तो इतना विद्वान नहीं हूं ,जितने बड़े विद्वानों के बीच बैठकर मैं सुन रहा था ,वहां यही सुनाई दे रहा था की, अब हमारे देश को हो क्या गया है उनमें ऐसे भी बहुत सारे लोग थे जो खुद भी लक्ष्मी के पुजारी हैं ,लेकिन बातें बहुत लंबी-लंबी कर रहे थे इतनी बातें लंबी-लंबी छोड़ रहे थे कि अगर आप उनकी बातें और उनकी करनी और कथनी को देख ले तो दांत तो चले उंगली दबा लेंगे।
मुख्यमंत्री बनने के लिए।
मुख्यमंत्री बनने के लिए जोड़ तोड़ भारी भरकम पार्टी फ़ंड की आवश्यकता होती है ,अब भारी भरकम बजट अपने घर से तो दिया नही जाएगा ,क्योकी घर से तो फक्कड़ बाबा है नेता जी कमाएंगे तो देंगे
केंद्र की राजनीति
केंद्र की राजनीति में सांसदों व राज्य सभा सदस्यों की आवश्यकता पड़ती है ,इसका प्रबंध देश के चोटी के उद्योग पति करते है और बदले में सरकार की सारी योजनाओं को निगल जाते है, कुछ निष्ठावान नेता भी होते है, स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी मात्र एक वोट कम रह जाने के कारण प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे कर विपक्ष में आकर बैठ गए थे।
जबकी एक वोट खरीद कर सरकार आसानी से बचाई जा सकती थीं, ऐसे नेता भी इस देश की शान रहे है।लेकिन आज तो सरकार बचाने के लिये दस बीस हजार करोड़ तो यूं ही लुटा दिये जायेंगे।
अधिकारी किसी के नही सबके है।
रही बात अधिकारियों की अधिकारी किसी के नहीं होते आज बीजेपी है ,तो ये बीजेपी के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। कल कांग्रेस आ जाएगी तो कांग्रेस के साथ वही काम करेंगे जो बीजेपी के साथ कर रहे थे, अधिकारी वही है, और इनका काम भी वही है ,जो यह कर रहे हैं ,पहले यह काम बीजेपी के लिए क्या करते थे।

अब कांग्रेस के लिए कर लेंगे कल को बीएसपी आएगी बीएसपी के लिए कर लेंगे सपा आएगी सपा के लिए कर लेंगे ,इनको तो अपना कर्तव्य निभाना है और पूर्ण निष्ठा के साथ यह अधिकारी अपने कर्तव्य का निष्ठा पूर्वक पालन करते हैं। और करते रहेंगे रही बात मां लक्ष्मी की अनुकंपा कि उनके ऊपर तो यह तो जिस दिन इन्होंने आईएएस ,आईपीएस या आईएफएस की डिग्री प्राप्त कर ली थी उसी दिन लक्ष्मी जी उनके घर जाकर विराजमान हो गई थी।
ईमानदारी भी अभी जिंदा है।
लेकिन अभी भी दुनिया ईमानदारी पर भी टिकी हुई है। बहुत सारे ऐसे अधिकारी भी हैं जो अपने पद की गरिमा बनाए हुए हैं । लेकिन ऐसे लोगों की संख्या उंगलीयो पर गिनने लायक होगी ये चंद अधिकारी बहुत ही हीन भावना से देखे जाते है है।
आज से 40 वर्ष पूर्व लोग कहते थे कि फलाना अधिकारी या फालना कर्मचारी बहुत भ्रष्ट है और अब यह जमाना आया है की खुलेआम लोग कहते हैं कि फलाना अधिकारी या फालना कर्मचारी बहुत ही ईमानदार है तो इतना परिवर्तन आया है समय परिवर्तनशील है। कभी-कभी मैं यह सोचता हूं जितनी दौलत इस देश के नेताओं और बू्रोक्रेट्स के पास है।
अगर यह सारा पैसा देश के विकास में लग जाए तो वास्तव में जिस भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, आज भी इस देश को सोने की चिड़िया बनने से कोई नहीं रोक सकता, लेकिन शायद अब यह केवल स्वप्न ही रह गया है,
