70 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 36 सीटें चाहिए। 2027 का चुनाव केवल भाजपा बनाम कांग्रेस की पारंपरिक लड़ाई नहीं होगा। रोजगार, सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता, पेपर लीक, भ्रष्टाचार के आरोप, पलायन, अंकिता भंडारी हत्याकांड, महिला सुरक्षा, स्थानीय विकास और दस वर्षों की सत्ता से पैदा होने वाली एंटी-इनकम्बेंसी जैसे मुद्दे मिलकर चुनावी मुद्दा बना सकते हैं।
भ्रष्टाचार अकेला ऐसा मुद्दा है की आम मतदाता को लगता है कि इससे उसकी अपनी जिंदगी प्रभावित हुई है। उत्तराखंड में भर्ती परीक्षाओं की अनियमितता और पेपर लीक का मुद्दा इसलिए अधिक संवेदनशील है क्योंकि इसका सीधा संबंध युवाओं के भविष्य और सरकारी नौकरी की उम्मीद से जुड़ता है। कांग्रेस ने हाल के अभियानों में भर्ती अनियमितताओं, पेपर लीक और बेरोजगारी को प्रमुख मुद्दा बनाया है।
यदि चुनाव से पहले यह धारणा मजबूत होती है कि योग्य युवाओं को नौकरी पाने के लिए , पैसा के साथ साथ राजनीतिक संपर्क की जरूरत पड़ती है, तो भ्रष्टाचार सामान्य राजनीतिक आरोप न रहकर ‘युवा बनाम व्यवस्था’ का मुद्दा बन जाएगा।

भ्रष्टाचारी
उत्तराखंड में सरकारी नौकरी लंबे समय से महत्वपूर्ण रोजगार विकल्प रही है। इसलिए भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी का प्रभाव केवल परीक्षा तक सीमित नहीं रहता। परीक्षा रद्द होना, दोबारा तैयारी में समय और पैसा लगना तथा चयन प्रक्रिया पर भरोसा कम होना सरकार के प्रति असंतोष पैदा कर सकता है।
अंकिता भंडारी मामला: भ्रष्टाचार और महिला सुरक्षा से जुड़ता सवाल
अंकिता भंडारी हत्याकांड महिला सुरक्षा, न्याय और प्रभावशाली लोगों के कथित संरक्षण से जुड़े सवालों के कारण भावनात्मक राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। 2026 में ‘VIP angle’ को लेकर फिर राजनीतिक विवाद उभरा और कांग्रेस ने इसे 2027 की राजनीतिक लड़ाई से जोड़ने की कोशिश की है।राज्य की महिलाएं इस हत्याकांड को किसी भी कीमत पर भुलाने को तैयार नही हैं।
पलायन और सवाल पहाड़ का सवालरोजगार और पलायन को अलग-अलग मुद्दों की तरह देखना सही नहीं होगा। पहाड़ के गांवों से युवाओं का बाहर जाना, स्थानीय रोजगार की कमी, स्वास्थ्य-शिक्षा की सुविधाएं न होना व सड़क और कनेक्टिविटी चुनावी चर्चा में महत्वपूर्ण रहेंगे। कांग्रेस के लिए यह मुद्दा सरकार के खिलाफ स्थानीय असंतोष को जोड़ने का माध्यम हो सकता है। जो की भाजपा के लिए चुनौती होगा ।
महिला मतदाता और सुरक्षा
महिला सुरक्षा का मुद्दा अंकिता भंडारी मामले से आगे भी जाता है। यदि विपक्ष महिला सुरक्षा को रोजगार, न्याय और स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही के साथ जोड़ता है, तो यह प्रभावी चुनावी मुद्दा बन सकता है।
भाजपा की ताकत: संगठन और नेतृत्व
भाजपा के पास 2027 में केवल बचाव की राजनीति करने की आवश्यकता नहीं है। पार्टी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व, विकास कार्यों, धार्मिक पर्यटन, बुनियादी ढांचे, समान नागरिक संहिता और केंद्र-राज्य समन्वय को अपने पक्ष में मुद्दा बना सकती है।
भ्रष्टाचार और बेरोजगारी मौजूद होने के बावजूद चुनाव का परिणाम पहले से तय नहीं माना जा सकता। भाजपा के लिए महत्वपूर्ण रणनीति एंटी-इनकम्बेंसी को सरकार के बजाय व्यक्तिगत विधायकों तक सीमित रखना और जरूरत पड़ने पर उम्मीदवार बदलना होगी।
अंकिता भंडारी
कांग्रेस के लिए अवसर और जोखिम
कांग्रेस के पास सरकार विरोधी माहौल को राजनीतिक परिवर्तन में बदलने का अवसर है। लेकिन संगठनात्मक एकजुटता और उम्मीदवार चयन भी महत्वपूर्ण होंगे।
यदि कांग्रेस बेरोजगारी, पेपर लीक, भ्रष्टाचार, अंकिता भंडारी हत्याकांड, पलायन और महिला सुरक्षा को अलग-अलग मुद्दों की बजाय व्यापक ‘जवाबदेही’ के मुद्दे के रूप में पेश करती है, तो उसका प्रभाव अधिक हो सकता है।
2027 में संभावित मुद्दों की प्राथमिकता
1 रोजगार और सरकारी भर्ती
2 पेपर लीक और भर्ती में पारदर्शिता
3 सबसे महत्वपूर्ण भ्रष्टाचार और सरकारी जवाबदेही
4 अंकिता भंडारी हत्याकांड और महिला सुरक्षा
5 गढ़वाल में पलायन और पहाड़ी क्षेत्रों का विकास
6 स्थानीय विधायको का अब तक का प्रदर्शन कई सीटों पर निर्णायक होगा।
7 महंगाई सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन विकास
8 ऋषि केश में पेड़ों की कटाई का मामला।
भ्रष्टाचार व अंकिता भंडारी हत्याकांड भाजपा को पसीने दिलाएगा, लेकिन यदि भ्रष्टाचार का मुद्दा भर्ती और पेपर लीक से जुड़ता है, बेरोजगारी से जुड़ता है और उसके साथ अंकिता भंडारी तथा महिला सुरक्षा का सवाल भी जुड़ जाता है, तो यह सरकार के खिलाफ व्यापक नाराजगी का मुद्दा तैयार कर सकता है।
इसलिए 2027 की लड़ाई में भ्रष्टाचार एक स्वतंत्र मुद्दा कम और ‘मल्टीप्लायर’ अधिक होगा—जो दूसरे मुद्दों की राजनीतिक ताकत को कई गुना बढ़ा सकता है।
अंततः चुनाव का परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि अगले महीनों में कौन कौन से नए जनता को लुभाने वाले वादे व घोषणा धामी सरकार पेश करती हैं, महिला मतदाताओं के लिए उत्तर प्रदेश की तर्ज पर उत्तराखंड में भी धामी सरकार खजाना खोल सकती है।
सरकार की जवाबदेही कैसी रहती है, कांग्रेस कितना मजबूत संगठन खड़ा करती है, कयोंकि कांग्रेस में फिलहाल आधा दर्जन मुख्यमंत्री अपने को समझे बैठे हैं, इतने ही धडों में पूरे राज्य में कांग्रेस बटी हुई है।
