कामाख्या न्यूज
हरिद्वार
हरिद्वार में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के पुनर्गठन के बाद संत समाज के दो गुटों के बीच विवाद खुलकर सामने आ गया है। पुनर्गठित परिषद को लेकर जहां एक पक्ष इसे पूरी तरह वैधानिक बता रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे असंवैधानिक करार देते हुए लगातार विरोध जता रहा है।

सोमवार को कुंभ मेले की तैयारियों को लेकर मेला प्रशासन द्वारा आयोजित बैठक का एक गुट द्वारा बहिष्कार किए जाने से यह विवाद और गहरा गया।
यदि पुनर्गठन की वैधानिकता पर सवाल उठाए जा रहे हैं तो यह भी याद रखना होगा की पिछले वर्ष प्रयागराज कुंभ के दौरान भी निरंजनी गुट के छह अखाड़ों ने अखाड़ा परिषद का पुनर्गठन कर नए पदाधिकारियों की घोषणा की थी। उस समय भी परिषद में सभी अखाड़ों की सहमति नहीं थी। ऐसे में यदि वर्तमान पुनर्गठन को असंवैधानिक कहा जा रहा है तो प्रयागराज में गठित कार्यकारिणी की वैधता पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
बैठक में शामिल होने के बाद आवाहन अखाड़े के श्रीमहंत सत्यगिरि महाराज का बीच बैठक से बाहर निकल जाना भी चर्चा का विषय बना। इसे संत समाज की गरिमा और बैठक की गंभीरता के अनुरूप नहीं माना जा रहा है। कई लोगों का मानना है कि ऐसे घटनाक्रम सरकार और प्रशासन के साथ अनावश्यक टकराव का संकेत देते हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सरकार से टकराव की रणनीति किसी भी पक्ष के लिए भारी पड़ सकती है। दूसरे गुट से जुड़े कई ऐसे मामले समय-समय पर चर्चा में रहे हैं, जिन पर यदि प्रशासन गंभीरता से कार्रवाई करे तो परिस्थितियां बदल सकती हैं।
इनमें मनसा देवी मंदिर प्रकरण, न्यायालय के आदेशों से जुड़े विवाद, ट्रस्ट संबंधी सवाल, कथित वित्तीय अनियमितताओं तथा अन्य प्रशासनिक मामलों का उल्लेख होता रहा है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अखाड़ा परिषद के पुनर्गठन को लेकर शुरू हुआ विवाद केवल धार्मिक संगठनों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसके राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव भी दिखाई दे सकते हैं। कुछ संत तो यह भी कह रहे हैं की संत का चोला धारण करने वालों को अहंकार त्याग कर सनातन धर्म के प्रचार प्रसार के लिए कार्य करना चाहिए, धन के बल पर प्राप्त की गई लोकप्रियता कुछ दिन की मेहमान होती है.
